सन् 1942 में जब सम्पूर्ण देश में आज़ादी के लिए ‘करो या मरो’ की भावना व्याप्त थी, महात्मा गाँधी ने सम्पूर्ण भारत को एक सूत्र में जोड़ने के लिए ‘हिन्दुस्तानी ज़बान’ की ज़रूरत महसूस की। 26 अप्रैल सन् 1942 को उन्होनें ‘हरिजन’ में राष्ट्रभाषा का ज़िक्र करते हुए ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ की परिकल्पना के सन्दर्भ में अपने विचार व्यक्त किये कि “आसान हिन्दी और आसान उर्दू दोनों भाषाओं के मेल से जो भाषा बनती है, वह हिन्दुस्तानी है। इस हिन्दुस्तानी भाषा के लिए देवनागरी और उर्दू दोनों लिपियों के इस्तेमाल की ज़रूरत है।’’ उन्होंने इस बात की इच्छा ज़ाहिर की कि “इस काम को पूरा करने के लिए हम लोग ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ का गठन करेंगे।’’ 5 मई सन् 1942 को अपने सपने को साकार करने के लिए उन्होंने वर्धा ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ की स्थापना की। उसके ठीक बाद ही मुंबई में भी उन्होंने ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ की शुरुआत की।

      श्रीमती पेरीन बहन कैप्टेन और श्री मोरारजीभाई देसाई ने ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ के विकास में अपना ख़ून-पसीना एक कर दिया। श्रीमती पेरीन बहन कैप्टन के निधन के बाद उनकी बड़ी बहन श्रीमती गोशी बहन कैप्टेन ने सभा का कार्यभार संभाला। आगे चलकर अनेक महानुभावों ने ‘सभा’ की प्रगति में उल्लेखनीय योगदान दिया।

      आज ‘सभा’ का कार्यालय अपने स्वयं के पाँच मंज़िली इमारत में है, जिसका नाम ‘महात्मा गाँधी मेमोरियल बिल्डिंग’ है। इसके लिए श्रीमती पेरीनबहन कैप्टन के सप्रयासों से महाराष्ट्र सरकार ने नेताजी सुभाष रोड पर दो हज़ार वर्गग़ज का भूखंड प्रदान किया था। देश के तत्कालीन प्रधानमंत्री श्री जवाहरलाल नेहरू और वित्तमंत्री श्री मोरारजीभाई देसाई की स़िफारिश पर ‘सभा’ को भवन-निर्माण के लिए ‘गाँधी स्मारक निधि’ ने पाँच लाख रुपयों की राशि प्रदान की। भवन-निर्माण में श्रीमती पेरीन बहन कैप्टन और उनकी बहन श्रीमती गोशी बहन कैप्टन ने महत्त्वपूर्ण भूमिका निभायी।

‘भवन-निर्माण’ हो जाने पर ‘हिन्दुस्तानी प्रचार सभा’ अनेक गतिविधियों की ओर प्रवृत्त हुई। विभिन्न परीक्षाओं के संचालन (परीक्षा विभाग के अन्तर्गत विस्तृत उल्लेख) के साथ-साथ महात्मा गाँधी मेमोरियल रिसर्च सेण्टर और लाइब्रेरी की भी शुरूआत की गयी।