'हिन्दुस्तानी प्रचार सभा' द्वारा अखिल भारतीय स्तर पर विद्यार्थियों के लिए आयोजित पेरीनबेन कैप्टन अखिल भारतीय हिन्दी निबंध प्रतियोगिता (विषय : क्या भारत कभी विकसित देश बनेगा या हमेशा विकासशील देश ही रहेगा।) आयोजित की गई। दिनांक 12 फरवरी 2026 को तीन निर्णायकों द्वारा साक्षात्कार के उपरांत 13 फरवरी 2026 को पुरस्कार वितरण समारोह आयोजित किया गया। 16 राज्यों से 480 निबन्ध प्राप्त हुए जिनमें से 12 का चयन किया गया, निबंधों को जांचने व साक्षात्कार की ज़िम्मेदारी डॉ. सुनीता मिश्रा, डॉ. रमा सिंह व डॉ. वैसाली पाचुंदे ने निभायी।
न्यासी व कोषाध्यक्ष श्री अरविंद डेगवेकर ने विद्यार्थीयों को सभा की गतिविधियों की जानकारी साझा की तथा उनका उत्साहवर्धन किया। निर्णायक में डॉ. सुनीता मिश्रा तथा डॉ. वैशाली पाचुंदे ने विद्यार्थियों को शुभकामनाएँ देते हुए भविष्य की उज्जवल कामना दी।
प्रतियोगिता में सोहम अनिल भंडारकार, धुलिया, महाराष्ट्र पुरस्कार, सुश्री सुप्रिया ओझा, आगरा, को द्वितीय व सुश्री रीति कुमारी, गोवा को तृतीय पुरस्कार के रूप में क्रमशः रु.15,000/-, रु.12,000/- और रु.10,000/- तथा रु.3000/- का तीन प्रोत्साहन पुरस्कार सुश्री प्रज्ञा, लखनऊ, सुश्री एम. अद्यशा प्रियदर्शिनी, राऊरकेला, उड़ीसा तथा प्रवीण कुमार त्रिपाठी बांदा, उत्तरप्रदेश को प्रदान किया गया।
कार्यक्रम के प्रारंभ में डॉ. रीता कुमार (विशेष कार्य अधिकारी) ने कार्यक्रम की भूमिका बताई, राकेश कुमार त्रिपाठी, परियोजना समन्वयक ने निर्णायकों का परिचय देते कार्यक्रम का संचालन तथा पुरस्कारों की घोषणा की।
कोयंबत्तूर. अविनाशी रोड स्थित पीएसजी कॉलेज ऑफ आर्ट्स एंड साइंस के हिंदी विभाग और हिंदुस्तानी प्रचार सभा, मुंबई के संयुक्त तत्वावधान में मंगलवार को हिंदी भाषण और निबंध लेखन आदि अंतर्महाविद्यालयीन प्रतियोगिताओं का आयोजन किया गया। पोदिगै सभागार में आयोजित इस कार्यक्रम में पारंपरिक रूप से प्रार्थना और दीप प्रज्ज्वलन के बाद स्वागत भाषण देते हुए हिंदी विभाग की विभागाध्यक्षा डॉ. जी. रेणुका ने कहा कि इस आयोजन में 15 महाविद्यालयों के करीब 200 विद्यार्थी भाग ले रहे हैं। ऐसे आयोजन हिंदी के विकास के साथ-साथ देश की अन्य क्षेत्रीय भाषाओं और विविध संस्कृतियों को भी मजबूत बनाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। अध्यक्षीय भाषण देते हुए प्रभारी प्रधानाचार्य डॉ. एम. सेंगुट्टुवन ने कहा कि वर्तमान समय में हिंदी के साथ-साथ देश की अन्य भाषाओं को भी प्रोत्साहित किए जाने की जरूरत है। इस तरह के आयोजन इस दिशा में एक सार्थक कदम साबित हो सकते हैं। मुख्य अतिथि एवं राजस्थान पत्रिका चेन्नई के संपादक डॉ. पी.एस. विजयराघवन ने कहा कि भाषा हमें जोड़ने का काम करती है। सही ढंग से किसी भाषा को सीखने के लिए उसे सुनना बहुत जरूरी है। सुनने से हमारा शब्द भंडार तो बढ़ता ही है साथ ही साथ हमें अपने विचारों को सही ढंग से अभिव्यक्त करने में भी मदद मिलती है। हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के परियोजना समन्वयक राकेश कुमार त्रिपाठी ने कार्यक्रम की विविधता और उसके उपयोग के साथ हिंदुस्तानी प्रचार सभा, मुंबई की ओर से संचालित विविध कार्यक्रमों पर प्रकाश डाला और प्रतिभागियों के उज्जवल भविष्य की कामना के साथ सभी विद्यार्थियों को प्रतियोगिता में भाग लेने के लिए प्रोत्साहित किया। कार्यक्रम का संचालन हिंदी विभाग के सहायक प्राध्यापक डॉ. कुंवर संजय विक्रम सिंह और धन्यवाद ज्ञापन सहायक प्राध्यापक गौरव सिंह ने किया। सहायक प्राध्यापक डॉ. अर्चना त्रिपाठी ने प्रतिभागियों को प्रतियोगिता के नियमों के बारे में विस्तार से समझाया। सहायक प्राध्यापक डॉ. सतीश कुमार श्रीवास्तव एवं महाविद्यालय के विद्यार्थियों का भी सराहनीय योगदान रहा।
स्वतंत्रत दिवस भारत का एक दिन का समारोह नहीं बल्कि गर्व व स्वाभिमान का दिन है।
हिन्दुस्तानी प्रचार सभा द्वारा स्वतंत्रता दिवस के एक दिन पूर्व हिन्दीतर भाषी शिक्षकों के स्वाभिमान व सम्मान का दिन रहा। हिन्दी शिक्षा के क्षेत्र में योगदान तथा समर्पण को देखते हुए महाराष्ट्र्, गोवा, कोयम्बटूर, केरल, तमिलनाडु तथा पॉन्डिच्चेरी के शिक्षकों को ''महात्मा गाँधी हिन्दी शिक्षा प्रतिभा सम्मान'' से सम्मानित किया गया। इस अवसर पर मुख्य अतिथि के रूप में नवभारत टाईम्स के संपादक कप्तान सुंदर चंद ठाकुर ने विद्यार्थियों तथा शिक्षकों में भारत के अतुलनीय गौरव और वर्तमान तथा सुंदर भविष्य की कल्पना को साकार करने की ओर प्रेरित किया। सभा के न्यासी व मानद कोषाध्यक्ष श्री अरविंद डेगवेकर ने सभा के भविष्य की परिकल्पना तथा उसकी उपलब्धियों पर प्रकाश डाला। विशेष कार्य अधिकारी डॉ. रीता कुमार तथा परियोजना समन्वयक राकेश कुमार त्रिपाठी ने कार्यक्रम का संचालन किया व सूत्रधार की भूमिका निभायी। कार्यक्रम के अंत में देवमणि पाण्डेय के संयोजन में कवि सम्मेलन भी आयोजित किया गया। श्री विनोद दुबे, रोशनी किरण तथा दमयंती शर्मा ने अपनी कविताओं और गजलों से श्रोताओं को भावविभोर कर दिया। महाविद्यालयों से बड़ी संख्या में विद्यार्थियों ने भाग लिया।
हिंदुस्तानी प्रचार सभा, मुंबई के नये शैक्षणिक सत्र काआगाज़। एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी से। विषय : 'आदिवासी साहित्य और उसकी चुनौतियाँ'। इसकी प्रस्तावना दी 'हिं प्र स' की विशेष कार्याधिकारी व 'हिंदुस्तानी ज़बान' पत्रिका की संपादक डॉ रीता कुमार ने। सभा के ट्रस्टी व मानद सचिव श्री फिरोज़ पैच ने अपने स्वागत वक्तव्य में 'धरा पर बसे आदिवासियों की पहली मलकियत' पर प्रकाश डाला। बाकी हम सब तो विस्थापित हुजूम हैं। स्वार्थी और चतुर। खुद को पुनः स्थापित करने के लिए हमने आदिवासियों के संसाधनों को हथियाना शुरू किया। परिणाम एक अबूझी पहेली बन कर रह गया। स्थापित विस्थापित हो गये और हम---! यही है यथार्थ!!
संगोष्ठी के मुख्य अतिथि श्री संतोष चौबे, प्रथम सत्र के अध्यक्ष डॉ करुणाशंकर उपाध्याय, द्वितीय सत्र के अध्यक्ष डॉ दामोदर खडसे ने सभी प्रबुद्ध वक्ताओं के वक्तव्यों से सहमति जताई और यह स्वीकार किया कि आदिवासियों की मार्मिक अनुभूतियाँ तो वे स्वयं ही समझते हैं क्योंकि वे ही झेलते हैं। हम तो रखते हैं सिर्फ सहानुभूति; कुछ सुनकर कुछ पढ़कर। और चला देते हैं कलम। बन जाते हैं उनके मसीहा। "हमें मसीहा नहीं, सहयोगी चाहिए।" पीड़ायुक्त स्वाभिमानी दृढ़ता थी आदिवासी सुश्री वंदना टेटे की वाणी में। पर्यावरण की महत्ता में उन्होंने आदिवासी बोली में एक मधुर गीत भी सुनाया। आदिवासी प्रो डॉ विनोद कुमरे ने 'जय जोहार' अर्थात 'सबका कल्याण करनेवाली धरती की जय हो' के साथ अपना वक्तव्य शुरू किया। पर्यावरण से प्रेम और उसकी रक्षा ही आदिवासियों कि परम धर्म है।और यही इतर लोगों का भी होना चाहिए। पर 'मुनाफ़ा' और 'संचय' की आपाधापी में पूँजीवादी उसका हनन करने में जुटे हैं। यह प्रहार है आदिवासियों की जीविका पर, उनकी जीवन शैली पर, उनकी आस्था पर। ऐसे में उन्हें अपने अस्तित्व और जिजीविषा की चिंता होना स्वाभाविक है। और उसके खिलाफ़ आवाज़ उठाना उनका अधिकार। आदिवासी श्री अविनाश पोईनकर ने जोशीली वाणी में आदिम आदिवासी से अपनी बात शुरू करते हुए यह मुद्दा उठाया कि एक शिक्षित आदिवासी जो विस्थापित होकर मुख्य धारा में मिल चुका है उसके पास अब भाषा है, अपनी स्थिति को व्यक्त करने के लिए; पर उन 'ख़ालिस' अनपढ़ आदिवासियों का क्या जिनकी बोली भी उनकी अपनी नहीं रही। वह विलुप्त हो गयी, राजनीतिक दाँव-पेच में। ऐसे में उनके ऑरेचर् (वाचिक) साहित्य का हश्र क्या? वे जैसे-तैसे सँभाले हुए हैं अपने हुनर को, कला-कौशल को, ज्ञान को, पर कब तक?
सुश्री मधु कांकरिया जो कई वर्ष आदिवासी क्षेत्रों में रहीं, उन्होंने अपने परोक्ष अनुभवों को साझा किया। आदिवासी समुदाय जो हर तरह की प्राकृतिक संपदा से संपन्न है, वह इतना दीन-दुखी क्यों? उत्तर स्पष्ट है--- भुमंडलीकरण और बाजारवाद की मार! पूरा सच कोई जानना चाहता है तो वह जाए और रहे उनके साथ वर्षों तक, उनकी तरह। सिर्फ़ पर्यटक बनकर जाने से आप आदिवासी साहित्यकार नहीं बन सकते। संगोष्ठी का जितना वृहद् और नाज़ुक विषय उतनी गहन और समृद्ध विद्वान वक्ताओं की संवेदना। बात आदिवासियों के स्वामित्व की जो थी। उनका अतीत, वर्तमान और भविष्य। यानि आदिवासी-विमर्श के विविध आयाम। डॉ जवाहर कर्नावट ने पत्रकार की हैसियत से लिए आदिवासी संबंधित साक्षात्कारों पर प्रकाश डाला और इस तथ्य को सराहा कि आदिवासी बोलियों और भाषाओं, बल्कि सभी भाषाओं, का संरक्षण उस क्षेत्र की संस्कृति जानने के लिए ज़रूरी है। आदिवासी संस्कृति के भविष्य की बात की डाॅ हूबनाथ पांडेय ने। और डाॅ बजरंग बिहारी तिवारी ने पूर्व आधुनिक हिंदी साहित्य में आदिवासी पात्रों पर बात करते हुए इस बात पर ज़ोर दिया कि वे तब भी मुख्य धारा से संबंधित थे और आज भी हैं। हाँ तौर-तरीके बदल सकते हैं। बात जब आदिवासी साहित्य की थी तो संबंधित भ्रामक विचारों का निवारण भी ज़रूरी था। जैसे : आदिवासी साहित्य किसे कहें? आदिवासी साहित्यकारोंं द्वारा रचा साहित्य, आदिवासी साहित्यकारों द्वारा आदिवासियों पर रचा साहित्य या गैर आदिवासी साहित्यकारों द्वारा आदिवासियों पर रचा साहित्य। तर्क अनेकों। श्री भालचंद्र जोशी ने आदिवासी जीवन के यथार्थ को सामने रखकर उनके द्वारा रचे गये तमाम साहित्य का उल्लेख भी किया। कार्यक्रम का संचालन राकेश कुमार त्रिपाठी बहुत सतर्कता से करते रहे। यह तो थी संक्षेप में मंच की बात। मंच के सामने का दृश्य तो और भी लुभावना। कनिष्ठ महाविद्यालयों के हिंदी प्रेमी विद्यार्थियों का टोला, अपने शिक्षकों के साथ। ऐसा प्यारा दृश्य बहुत कम दिखता है। यानि सभागृह के बाहर तक युवा श्रोता। फिर कैसे कोई माने कि हिंदी नयी पीढ़ी पर अपना वर्चस्व खोती जा रही है। डॉ रीता कुमार ने प्रस्तावना में कहा कि, "ऐसी संगोष्ठियों के पीछे मेरा मकसद यही है कि हमारे सामने बच्चे बैठे हों।" और वे थे। अंत तक। उसी तादाद में। पूरे कार्यक्रम की व्यवस्था अति उत्तम। श्रोताओं के रूप में वरिष्ठ साहित्यकारों से सजे उस माहौल में हर कोई मुग्ध।
हिन्दुस्तानी प्रचार सभा तथा बॉम्बे साइकियाट्रिक सोसाइटी के संयुक्त तत्वाधान में दिनांक 1 ऑक्टोबर 2024 को चर्चगेट स्थित इंडियन मर्चेंट चैंबर में एक दिवसीय सेमिनार का आयोजन किया गया। कार्यक्रम का उद्घाटन करते हुए प्रसिद्ध मनोचिकित्सक डॉ. हरीश शेट्टी ने जीवन की आवश्यक जरूरतों के बारे में बताते हुए हर छोटी-छोटी बातों पर बच्चों के बदलते मनोविज्ञान के विषय में जागरूक किया। सभा के न्यासी व मानद सचिव श्री फिरोज पैच ने मानव जीवन के बदलते मूल्यों के बारे में अपने विचार रखे । बाम्बे साइकियाट्रिक सोसाइटी की अध्यक्ष डॉ. रुक्षेदा सैय्यदा ने विद्यार्थियों के इमोशन, फीलिंग के संबंध में अनेक पहलुओं पर चर्चा की और मानसिक स्वास्थ्य जागरूकता के विषय में बताते हुए पूरे कार्यक्रम को सफल बनाने में महत्वपूर्ण योगदान दिया।
डॉ. मानसी जैन ने बेहतर आत्म छवि और आत्मसंवाद के साथ ही दैनिक जीवन में अधिक सोचने, काम को टालने और परीक्षा की घबराहट से उबरने के तरीके के बारे में विद्यार्थियों से अपने अनुभव साझा किए। डॉ. प्रियंका महाजन ने जीवन में सही निर्णय लेना और नशीले पदार्थों को ना कहने की आदत को लाने की बात की तथा विद्यार्थियों के भीतर उठते द्वन्द्व के कारण हर छोटी बातों पर अपने आपको समाप्त करने (सुसाइड) जैसी अव्यावहारिक परिस्थियों से निपटने कि स्थिति को समझने व जीवन को बेहतर मार्ग पर ले जाने के तरीके को बताया।, सुश्री मेहजबीन डोरडी, डॉ. किरण जठार व डॉ. संतोष कौल काक ने पैनल वार्ता में विद्यार्थियों से कॉलेज और उससे आगे के निर्णयों के साथ ही जीवन में आने वाली समस्याओं को समझने और उन्हें लिखकर उसपर विचार करने के लिए विद्यार्थियों को प्रेरित किया साथ ही जीवन कि उन तमाम परिस्थितियों जिसे वे समस्या या कठिनाई मानते हैं उसके अंतर को समझकर उसका निराकरण कर सकें उन बातों को साझा किया जिसका मॉडरेशन डॉ. अल्केश पाटील ने किया। डॉ. नाहिद दवे ने स्वास्थ्य के प्रति जागरूकता को लेकर अपनी चिंता प्रकट करते हुए विद्यार्थियों को उससे निपटान के कुछ उपाय साझा किए।
कार्यक्रम का संचालन सभा की विशेष कार्य अधिकारी डॉ. रीता कुमार ने तथा आभार ज्ञापन सभा के परियोजना समन्वयक राकेश कुमार त्रिपाठी ने किया। सभागार में 300 से अधिक विद्यार्थियों व शिक्षकों ने कार्यक्रम को सफल बनाने में सहयोग दिया व अपना ज्ञानार्जन किया।
हिन्दुस्तानी प्रचार सभा द्वारा महिला सशक्तीकरण- मिथ या वास्तविकता विषय पर दिनांक 16-17 फरवरी 2024 को दो-दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। इस संगोष्ठी के उद्घाटन सत्र के मुख्य अतिथि डॉ. भूषण कुमार उपाध्याय (पूर्व पुलिस महानिदेशक) ने ऋगवेद में वर्णित महिलाओं के कार्यों व उपलब्धियों बात करते हुए कहा कि ऋगवेद में भी 27 स्त्रियाँ मंत्र की दृष्टा मानी जाती हैं यदि उन्हें ऋगवेद पढ़ना वर्जित था? महिलायें हमेशा सबला रही हैं वे कभी अबला नहीं थीं। सभा की विशेष कार्य अधिकारी डॉ. रीता कुमार ने कार्यक्रम की प्रस्तावना प्रस्तुत की। सभा के ट्रस्टी एवं मानद सचिव फ़िरोज़ पैच ने स्वागत वक्तव्य देते हुए समाज में महिलाओं पर हो रहे विभिन्न प्रकार के अत्याचारों के आंकड़ों को प्रस्तुत किया। वरिष्ठ कथाकार सुधा अरोड़ा ने ‘साहित्य में महिला सशक्तीकरण के स्वर’ में अध्यक्ष की भूमिका निभाई तथा डॉ. हूबनाथ पाण्डेय, डॉ. मंजुला देसाई और डॉ. सतीश पाण्डेय वरिष्ठ कवि, आलोचक विजय कुमार, कथाकार ममता सिंह, डॉ. दिनेश पाठक, डॉ. सुमन जैन और भुवेन्द्र त्यागी ने ‘वर्तमान सामाजिक परिप्रेक्ष्य में महिला सशक्तीकरण’ विषय पर उद्बोधित किया।
‘महिला सशक्तीकरण और कानून’ पर आधारित दूसरे दिवस के अवसर पर सामाजिक कार्यकर्ता एवं अधिवक्ता आभा सिंह ने कहा कि हमारे देश में कानून तो बहुत हैं किन्तु समय सीमा और सख्ती न होने के कारण समाज में अराजकता बनी हुई है और अपराधी अपराध कर के भी खुले आम घूमता है। अधिवक्ता एलिन मार्कवीस, रिलयांस अस्पताल की डॉ. मेहज़बीन डोरडी ने समाज में हो रहे मानसिक विचारों को अपने दृष्टि से समझकर उन्हे सुलझाने के अपने प्रयासों पर बल दिया और चित्रा देसाई ने अपने वक्तव्य प्रस्तुत किए। विभिन्न महाविद्यालयों के शिक्षक और विद्यार्थियों ने कार्यक्रम में अपना सहभाग दिया। कार्यक्रम का संचालन परियोजना समन्वयक राकेश कुमार त्रिपाठी तथा गंगाशरण सिंह ने किया। अंतिम सत्र में श्रीमती शशि निगम ने अपनी स्वरांजलि म्यूजिक अकादमी के सदस्यों के साथ नारी शक्ति के सुर विषय पर संगीतमय प्रस्तुति से श्रोताओं/ दर्शकों को भाव विभोर कर दिया।
भाषाई एकता कहलाने वाला उत्सव “विश्व हिन्दी दिवस” पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय के हिन्दी विभाग, हिन्दी अनुभाग और हिन्दुस्तानी प्रचार सभा, मुंबई तथा नॉटनल, लखनऊ के संयुक्त तत्तावधान में 10-11 जनवरी 2024 को आयोजित किया गया। विश्वविद्यालय के कुलपति (प्रभारी) आचार्य के.तरणिक्कारसु द्वारा समारोह के मुख्य अतिथि श्री श्रीकांत करूणेश, शैक्षणिक सलाहकार, शिक्षा मंत्रालय, भारत सरकार, श्री राकेश कुमार त्रिपाठी, परियोजना समन्वयक, हिन्दुस्तानी प्रचार सभा, मुंबई, श्री नीलाभ श्रीवास्तव, नोटनल, ईबुक प्लेटफार्म, लखनऊ, हिन्दी विभाग की आचार्या एवं विभागाध्यक्षा, सह-आचार्य, हिन्दी अधिकारी, अन्य विश्वविद्यालयों से पधारें दिग्गजनों, साहित्यकारों तथा छात्र-छात्राओं की उपस्थिति में दीपप्रज्वलन के साथ द्वि-दिवसीय कार्यक्रम की औपचारिक शुरुआत कर वैश्विक स्तर पर हिन्दी को बढ़ावा देने तथा दुनियाभर के तमाम देशों में बसे भारतीयों को एक सूत्र में बांधने हेतु सरकार की इस पहल की सराहना करते हुए हिन्दी दिवस की शुभकामनाएँ प्रदान की।
इस अवसर पर “कृत्रिम मेधा की भूमिका एवं महत्व” विषय पर आयोजित अंतरमहाविद्यालयीन वाक्-स्पर्धा में पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय और अन्य विश्वविद्यालयों के लगभग 63 विद्यार्थियों ने गूगल फॉर्म द्वारा पंजीकरण किया और 45 विद्यार्थियों ने इसमें वक्तव्य दिया जिन्हें प्रथम, द्वितीय, तृतीय और 3 प्रोत्साहन पुरस्कारों से सम्मानित किया गया जिसकी निर्धारित राशि क्रमश: 5,000/-, 4,000, 3,000/- एवं 1,000/- रुपयें थी।
इसी क्रम में पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय के पुस्तकालय में उपर्युक्त विषय पर ही राष्ट्रीय संगोष्ठी के 4 सत्रों का भी आयोजन किया गया, जिसमें डॉ. शशि मुदिराज, हैदराबाद; प्रो. लता चौहान, बेंगलूर; प्रो.राम प्रकाश ,तिरुपति; डॉ.गजेंद्र पाठक, हैदराबाद; डॉ. निशा,पांडिच्चेरी; डॉ. उमा देवी, पांडिच्चेरी; डॉ.जगनाथ रेड्डी, चिदंबरम; डॉ. सुरेंद्रन, पांडिच्चेरी; डॉ. आशिता,पांडिच्चेरी; डॉ. ए. राधिका, पांडिच्चेरी; डॉ. अनिता सिंह, पांडिच्चेरी, डॉ. राजरत्नम,तिरुवारुर; श्री विनय ठाकुर, पांडिच्चेरी जैसे विद्वजनों तथा जेआरएफ शोधार्थियों ने अपने प्रपत्रों का वाचन किया। पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय के कुलसचिव प्रभारी आचार्य रजनीश भूटानी, डॉ. अरविन्द गुप्ता, निदेशक, दूरस्थ शिक्षा, डॉ
हिन्दुस्तानी प्रचार सभा तथा पी एस जी आर्ट्स ऐंड साइंस कॉलेज, कोयंबतूर के संयुक्त तत्त्वावधान में दिनांक 13 फ़रवरी 2024 को अंतर महाविद्यालयीन वाक् स्पर्धा का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए प्राचार्या डॉ. डी. वृंदा ने विद्यार्थियों का मनोबल बढ़ाते हुए विभिन्न महाविद्यालयों से आए हुए प्रतियोगियों को बढ़ चढ़कर हिस्सा लेने के लिए प्रोत्साहित किया।
प्रतियोगिता में 15 महाविद्यालयों के 76 प्रतिभागियों ने हिस्सा लिया। सभा की ओर से परियोजना समन्वयक राकेश कुमार त्रिपाठी ने क्रमशः प्रथम पुरस्कार हॉलीक्रॉस कॉलेज, त्रिची की संजना कुमारी, द्वितीय पुरस्कार कृष्णामल कॉलेज की दिव्यांशी गौड़, तृतीय पुरस्कार कवरी कॉलेज की एन गुंजन, तथा पी एस जी कॉलेज की अनघा सूजन व हॉलीक्रॉस कॉलेज की एम मनीषा जैन को प्रोत्साहन पुरस्कार प्रदान किया। कार्यक्रम का संयोजन हिन्दी विभागाध्यक्ष जी रेणुका ने किया। निर्णायकों डॉ आर विजय लक्ष्मी, राकेश कुमार त्रिपाठी, तथा जी खुशबू ने निभाई। 120 से अधिक विद्यार्थी इस कार्यक्रम में उपस्थित रहे ।
सभा के पूर्व निदेशक, स्मृति शेष संजीव निगम के संस्मरणों की पुस्तक ‘मैं क्या जानूँ, क्या जादू है’ का लोकार्पण हुआ। प्रतिष्ठत कथाकार सूर्यबाला ने अध्यक्षता तथा वागीश सारस्वत, शशि निगम, सुभाष काबरा एवं डॉ. संतोष कौल ने पुस्तक पर अपने विचार प्रस्तुत किए। संचालन राकेश कुमार त्रिपाठी एवं गंगाशरण सिंह ने किया। डॉ. रीता कुमार ने सभी अतिथियों और श्रोताओं के प्रति धन्यवाद ज्ञापन किया।
8 दिसंबर 2023 को सभा के सभागार में संस्मरण और साहित्य विषय पर केन्द्रित एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन सम्पन्न हुआ। मुख्य अतिथि देश के प्रतिष्ठत चित्रकार, लेखक अशोक भौमिक तथा देवमणि पांडेय, रमन मिश्र एवं यूनुस खान प्रमुख वक़्ता थे। डॉ. रीता कुमार ने कार्यक्रम की प्रस्तावना तथा सभा के ट्रस्टी एवं मानद सचिव फ़िरोज़ पैच ने अपने संस्मरण सुनाते हुए सभा की उपलब्धियों पर भी रोशनी डाली।
हिन्दुस्तानी प्रचार सभा द्वारा शिक्षण वर्ष 2023-24 के लिए महाविद्यालयों के विद्यार्थियों के वाक्-स्पर्धा 25 अक्तूबर 2023 से शुरू की गयी। मणिबेन नानावटी कॉलेज, बी.एम.रुइया कॉलेज, नेशनल कॉलेज, सोफिया कॉलेज में वाक्-स्पर्धा का आयोजन किया गया। अगले 1 माह में लगभग 15 कॉलेज में इस प्रतियोगिता का आयोजन करने की योजना है।
सभा द्वारा पुस्तकालयों की चुनौतियों पर एक परिचर्चा का आयोजन
24 नवंबर 2023 को सभा के सभागार में पुस्तकालयों की चुनौतियों पर एक परिचर्चा का आयोजन किया गया। लाइब्रेरी साइंस की प्रखर लेखिका और एस.एन.डी.टी विश्वविद्यालय की सेवानिवृत्त लाइब्रेरियन डॉ. सुषमा पौडवाल, रामभाऊ म्हालगी प्रबोधिनी, मुंबई के पुस्तकालयाध्यक्ष श्री दिलीप नवले ने कार्यक्रम की अध्यक्षता की। सभा के ट्रस्टी एवं मानद सचिव श्री फ़िरोज़ पैच, विशेष कार्य अधिकारी डॉ. रीता कुमार और पुस्तकालय के सलाहकार श्री आर.एल. जोशी मंच पर उपस्थित थे। इस सेमिनार में विभिन्न विद्यालयों एवं सार्वजनिक पुस्तकालयों के लगभग 28 पुस्तकालयाध्यक्ष उपस्थित थे।
सभा द्वारा केन्द्रीय कारागारों में पुस्तकालय की अपनी गतिविधि को आगे बढ़ाते हुए पश्चिम बंगाल के एडीजी व आईजी से दिनांक 06 दिसंबर 2023 को सभा के परियोजना समन्वयक राकेश कुमार त्रिपाठी ने मुलाकात की इसके अंतर्गत पश्चिम बंगाल के 12 केन्द्रीय कारागारों में पुस्तकालय शुरु करने की अनुमति प्राप्त हुई।
आर्टिफिशियल इंटेलिजेन्स की वर्तमान में जरूरत इस विषय पर अंतर महाविद्यालयीन वाक् स्पर्धा का आयोजन किया गया। मुंबई के 15 महाविद्यालयों के 26 छात्र-छात्राओं ने इस प्रतियोगिता में भाग लिया एवं पुरस्कार प्राप्त किया। श्री देवमणि पाण्डेय, श्री संस्कार देसाई एवं डॉ सुनीता साखरे ने इस प्रतियोगिता में निर्णायक की भूमिका निभाई। कार्यक्रम का संचालन डॉ रीता कुमार एवं राकेश कुमार त्रिपाठी ने किया।
हिन्दुस्तानी प्रचार सभा द्वारा महात्मा गाँधी जयंती के अवसर पर श्रीमती शशि निगम के निर्देशन में स्वरांजलि म्युजिक एकेडमी ने भजन कार्यक्रम सभा के सभागृह में प्रस्तुत किया।