हिंदुस्तानी प्रचार सभा, मुंबई के नये शैक्षणिक सत्र काआगाज़। एक दिवसीय राष्ट्रीय संगोष्ठी से। विषय : 'आदिवासी साहित्य और उसकी चुनौतियाँ'। इसकी प्रस्तावना दी 'हिं प्र स' की विशेष कार्याधिकारी व 'हिंदुस्तानी ज़बान' पत्रिका की संपादक डॉ रीता कुमार ने। सभा के ट्रस्टी व मानद सचिव श्री फिरोज़ पैच ने अपने स्वागत वक्तव्य में 'धरा पर बसे आदिवासियों की पहली मलकियत' पर प्रकाश डाला। बाकी हम सब तो विस्थापित हुजूम हैं। स्वार्थी और चतुर। खुद को पुनः स्थापित करने के लिए हमने आदिवासियों के संसाधनों को हथियाना शुरू किया। परिणाम एक अबूझी पहेली बन कर रह गया। स्थापित विस्थापित हो गये और हम---! यही है यथार्थ!!