हिन्दुस्तानी प्रचार सभा द्वारा लोक संस्कृति और साहित्य विषय पर एक दिवसीय संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कार्यक्रम की शुरुआत करते हुए डॉ. रीता कुमार ने प्रस्तावना दी तथा हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के न्यासी व कोषाध्यक्ष श्री अरविंद डेगवेकर ने सभा द्वारा की जा रही गतिविधियों पर प्रकाश डाला। सुप्रसिद्ध नाट्य निर्देशक और शिक्षाविद श्री वामन केंद्रे जी ने मुख्य अतिथि के रूप में अपनी भूमिका निभाते हुए कहा कि ''लोक संस्कृति और साहित्य दोनों एक दूसरे के पूरक हैं दोनों एक दूसरे में समाहित हैं। आज देखा जाए तो आयुर्वेद भी लोक संस्कृति की ओर मुखरित हो चला है। मुम्बई विश्वविद्यालय, लोक कला अकादमी के विभागाध्यक्ष, डॉ. गणेश चंदनशिवे तथा वरिष्ठ रंगकर्मी और अभिनेता श्री विमल वर्मा जी ने क्रमशः दोनों सत्रों की अध्यक्षता का भार संभाला। लेखिका व कवियित्री शैलेष श्रीवास्तव जी ने अपने वक्तव्य में लोगों को संबोधित करते हुए कहा कि जब कुछ नहीं था तब लोकसाहित्य था जिसमें नृत्य, संगीत, कला व अन्य बहुत सी चीजें आती थीं। आज लोक ही गायब है। कार्यक्रम की शोभा बढ़ाते हुए डॉ. रवींद्र कात्यायन ने 'लोकसंस्कृति की स्थिति और चुनौतियाँ', सुक्षी अर्चना मिश्रा ने लोक साहित्य की उर्वरभूमी – उत्तर प्रदेश, सुश्री निर्मला डोसी ने 'संस्कृति से मालामाल पूर्वोत्तर राज्य' विषय पर प्रकाश डाला।
महाराष्ट्र की लोक कलाओं पर श्री रमेश यादव ने उत्तराखंड के कुमाऊँ लोकगीतों में उभरता जनजीवन पर श्री हरिमृदुल ने, सुश्री विभारानी ने 'मिथिला का सामा चकेबा' तथा 'सिनेमा में लोक संगीत पर प्रभाव' विषय पर श्री हार्दिक भट्ट ने अपने विचार प्रस्तुत किए। कार्यक्रम का संचालन राकेश कुमार त्रिपाठी ने तथा गंगाशरण सिंह ने किया। विभिन्न महाविद्यालयों से उपस्थित शिक्षकों व विद्यार्थियों ने इसका लाभ उठाया।