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हिन्दुस्तानी प्रचार सभा

Hindustani Prachar Sabha

7, Netaji Subhash Road, Charni Road (West), Mumbai – 400 002

7208525985/9820129917

hps.sabha@gmail.com

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हिन्दुस्तानी प्रचार सभा

7, Netaji Subhash Road, Charni Road (West),
Mumbai – 400002
7208525985/9820129917
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PHOTO GALLERIES

  • उद्यमशीलता के लिए संवाद जरूरी है : न्यायमूर्ति धर्माधिकारी
  • अखिल भारतीय हिन्दी निबंध प्रतियोगिता 2025-26
  • लोकसंस्कृति और लोकगीत जो स्वयं को स्वयं से जोड़ता है… वामन केंद
  • हिन्दुस्तानी प्रचार सभा द्वारा पालघर के अभिनव विद्यालय
  • हर्षोल्लास के साथ संपन्न हुई गुरु नानक अंतर्महाविद्यालयीन प्रतियोगिता – वाक् स्पर्धा 2025
  • अंतर्महाविद्यालयीन प्रतियोगिताओं का आयोजन
  • महात्मा गाँधी हिन्दी शिक्षा प्रतिभा सम्मान 2025
  • आदिवासी साहित्य और उसकी चुनौतियाँ
  • आदिवासी क्षेत्र विसरवाडी, नंदुरबार में वाक स्पर्धा का आयोजन
  • नंदुरबार जिले के आश्रम स्कूलों में शब्दकोश वितरण
  • हम कदम एलजीबीटीक्यूआईए + के साथ संगोष्ठी का आयोजन
  • अच्छा मानसिक स्वास्थ्य : सफलता और खुशी की कुंज
  • भारत की तस्वीर बदलने की दिशा में एक पहल
  • अंतर महाविद्यालयीन वाक् स्पर्धा
  • पांडिच्चेरी विश्वविद्यालय में वाक् स्पर्धा एवं राष्ट्रीय संगोष्ठी का आयोजन
  • शिक्षा से संस्कार पैदा होते है – डॉ. भूषण कुमार उपाध्याय
  • महात्मा गाँधी हिंदी पत्रिका प्रकाशन पुरस्कार 2019-20
  • 21-22 सितम्बर 2019 को आयोजित अंतरराष्ट्रीय सेमिनार में
    हिंदुस्तानी ज़बान पत्रिका के क़ैदी विशेषांक का लोकार्पण
  • धर्मनिरपेक्षता हमारे लोकतंत्र का प्राण तत्त्व
  • मानसिक स्वास्थ्य कार्यशाला
  • अन्तरराष्ट्रीय हिन्दी दिवस
  • गाँधी निर्वाण दिवस पर वाक् स्पर्धा का आयोजन
  • हिन्दी कथा साहित्य के विविध आयाम विषय
  • पटना के बेऊर जेल में पुस्तकालय का उद्घाटन
  • महिला सशक्तीकरण पर द्वि-दिवसीय कार्यशाला
  • जेल में पुस्तकालय फोटो तेलंगाना
  • Sri Lanka Library Inauguration
  • Mauritius Library Inauguration
  • परी कथाओं का लोकार्पण समारोह
  • महिलाओं और बच्चों पर आधारित सम्मेलन
  • जेलों में सभा पुस्तकालय
  • दीर्घा

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    हिन्दी कथा साहित्य के विविध आयाम विषय

    'हिन्दुस्तानी प्रचार सभा' द्वारा दिनांक 9-3-2019 को हिन्दी कथा साहित्य के विविध आयाम विषय पर संगोष्ठी का आयोजन किया गया। कथा साहित्य के स्वरूप और वर्तमान संदर्भ में आए बदलाव पर उद्घाटन सत्र में डॉ. सुशीला गुप्ता ने अपना सारगर्भित बीज वक्तव्य दिया।
    अध्यक्षता करते हुए सभा के ट्रस्टी व मानद सचिव श्री फ़िरोज़ पैच ने जीवन में कहानियों के महत्त्व को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि आज कथा जगत् को सामाजिक विसंगतियाँ दूर करने वाले कथा साहित्य की ज़रूरत है। प्ऱोफेसर जगदीश्वर चतुर्वेदी ने मुख्य अतिथि पद से बोलते हुए कहा कि अध्ययन के नाम पर हमें ज़्यादा से ज़्यादा पढ़ने की आवश्यकता है। आज ज़रूरत है अनुभूति और स्मृति को बचाने की, तभी साहित्य जीवित रहेगा।
    प्रारम्भ में छाया गांगुली ने सरस्वती वंदना प्रस्तुत करके संगोष्ठी के लिए अनुकूल वातावरण बनाया। प्रस्तावना प्रस्तुत की श्री संजीव निगम ने। हिन्दुस्तानी प्रचार सभा के ट्रस्टी व कोषाध्यक्ष श्री अरविन्द डेगवेकर जी ने आभार व्यक्त किया।
    प्रथम सत्र में शोध-छात्रों के संदर्भ में ममता कालिया ने कहा कि पढ़ने की संस्कृति नष्ट नहीं हो रही है, बल्कि अलग-अलग रूपों में बढ़ रही है। कथ्य, कथा-साहित्य का प्राण होता है स्मृति के साथ कल्पना का होना भी आवश्यक है। सुधा अरोड़ा ने अपनी धारदार वाणी में स्पष्ट किया कि लेखन व्यवसाय नहीं है, सुखद तो बिलकुल नहीं। लेखन अभिव्यक्ति का माध्यम है, पर इसका समयानुकूल होना आवश्यक है। उन्होंने नारी सशक्तीकरण और दलित विमर्श पर भी अपने विचार व्यक्त किये। इसी सत्र में हिन्दुस्तानी प्रचार सभा द्वारा संचालित सरल हिन्दी कक्षा के विद्यार्थियों द्वारा कथा-कथन 'परदेसी' (ममता कालिया कृत 'परदेसी' कहानी) को प्रस्तुत किया गया।
    द्वितीय सत्र में डॉ. करुणाशंकर उपाध्याय ने भाषा-शिल्प की अनुकूलता पर अपने विचार रखे। उन्होंने कहा कि वर्तमान समस्याएँ प्रेमचंद के ज़माने से कम नहीं है, केवल उनका स्वरूप बदला है। लेखन के धरातल पर विविधता साहित्य में सम्पन्नता तो ला रही है, पर उसका कथ्य घटता जा रहा है और शिल्प ज़बरदस्ती थोपा जा रहा है। साहित्य की पठनीयता पर बोलते हुए सूर्यबाला ने कहा कि लेखक जितना संवेदनशील होता है, उतना ही पाठक भी। पठनीयता आज की सबसे बड़ी चुनौती है। लेखक की ज़िम्मदारी है कि वह पाठक को स्वयं की भाव-भूमि तक ले जाए।
    'माटी की सुगंध' पर बोलते हुए डॉ. प्रोफ़ेसर कलानाथ मिश्र ने कहा कि रचना में मौलिकता आवश्यक है, कृत्रिमता से पाठक दूर हो जाते हैं। उन्होंने अनेक उदाहरण देकर यह तथ्य स्थापित किया कि माटी की सुगंध वाली रचनाएँ कालजयी होती हैं।
    सुश्री मधु कांकरिया ने आदिवासी जीवन की झाँकी प्रस्तुत की। उन्होंने कहा : आदिवासी अर्थात् पहला मूल निवासी। आदिवासी समाज आदि धर्म का पालन करता है, न कि मन्दिर और मूर्ति पूजा करने में विश्वास। वह प्रकृति का पूजक होता है, स्वयं को धरती का पुत्र मानता है। आदिवासियों में मातृ सत्तात्मक परिवार होते हैं और पराक्रम पूज्य होते हैं और महिलाएँ भी सुरक्षित होती हैं। उनके समाज में शौर्य और पराक्रम पूज्य होते हैं। आदिवासी समाज शहर को बहुत कुछ देता है, पर शहर से लेता कुछ नहीं। सरकारी कार्यक्रम भी आदिवासियों को कुछ नहीं देते। आदिवासी जीवन का उन्होंने स्वयं उनके इल़ाकों में जाकर अध्ययन किया है और उनकी समस्याओं को समझा है। उन्होंने अपने अनुभव और अध्ययन के आधार पर उनकी समस्याओं को रेखांकित करते हुए अपनी कहानियों का उल्लेख किया।
    समापन सत्र को खुले मंच का रूप दिया गया। उमेश पाण्डेय, भूमिका कपूर, स्मृति सिंह, त्रिशिला तोंडारे, मनसा मिश्रा, शिवांगी मिश्रा ने प्रश्न पूछे, जिनका माकूल उत्तर देकर मंच पर उपस्थित वक्ताओं ने विद्यार्थियों की शंकाओं का समाधान किया। जनाब सैय्यद अली अब्बास ने काव्यात्मक रीति से आभार प्रदर्शित किया। सभागृह में भारी संख्या में विद्यार्थी, प्राध्यापक और साहित्य-प्रेमी उपस्थित थे।